बुधवार, 28 जून 2017

गया, असुर के नाम पर स्थापित एक तीर्थ

गयासुर को देख कर ही लोग मुक्ति पाने लग गए। पापी लोग भी स्वर्ग जाने लग गए। यमलोक सूना पड़ गया, देवताओं के लिए यज्ञ होने बंद हो गए। जिससे देवताओं को हविष्य मिलना बन्द हो गया परिणामस्वरूप उनकी शक्ति क्षीण होने लगी।  देवलोक में घबड़ाहट फ़ैल गयी......

पुराणों और धर्मग्रथों के अनुसार आदिकाल में जो मुख्य जातियां हुआ करती थीं, उनमें सुर यानी देवताओं को उत्कृष्ट और अपने कर्मों, उच्चश्रृंखलता और देव विरोधी होने के कारण असुरों यानी दैत्य, दानव और राक्षसों को हेय व हीन  माना गया है। पर इन अलग-अलग जातियों में भी विद्वान, पराकर्मी, शूरवीर, धर्मात्मा और नेकदिल पुरुषों के साथ ही अनेक महिला विदुषियों का जन्म भी हुआ था, जिन्होंने अपनी विद्वता, 
साहस, त्याग और प्रेम से दुनिया भर में अपनी जाति का नाम रौशन किया था। इनमें से कुछ को तो आज भी आदर-सम्मान से देखा जाता है और उनकी पूजा-अर्चना भी की जाती है। ऐसा ही एक नाम है गयासुर। कथाओं के अनुसार भस्मासुर के वंशज गयासुर ने अपनी कठोर तपस्या के बल पर विष्णु भगवान् से यह वर प्राप्त कर लिया कि उसका शरीर समस्त तीर्थों के बनिस्पत अधिक पवित्र हो जाए।जो भी उसे देखे या उसका स्पर्श कर ले उसे यमलोक नहीं जाना पड़े। ऐसा व्यक्त‌ि सीधे व‌िष्‍णुलोक जाए।

भगवान ने उसे यह वरदान दे तो दिया पर इसका बड़ा ही अप्रत्याशित फल हुआ। अब गयासुर को देख कर ही लोग मुक्ति पाने लग गए। पापी लोग भी स्वर्ग जाने लग गए। यमलोक सूना पड़ गया, देवताओं के लिए यज्ञ होने बंद हो गए। जिससे देवताओं को हविष्य मिलना बन्द हो गया परिणामस्वरूप उनकी शक्ति क्षीण होने लगी।  देवलोक में घबड़ाहट फ़ैल गयी। सब घबरा कर ब्रह्मा जी के पास गए। विचार-विमर्श के बाद फिर देवताओं ने फिर छल का सहारा लिया। ब्रह्मा जी गयासुर के पास गए और उससे कहा कि देवता एक ख़ास यज्ञ करना चाहते हैं जिसके लिए पवित्र स्थान चाहिए और तुम्हारे शरीर से पवित्र तो कोई जगह है ही नहीं तो तुम अपने शरीर को इस काम के  लिए प्रस्तुत करो।  गयासुर इसके ल‌िए तैयार हो गया और उत्तर की तरफ       
पांव और दक्षिण की ओर मुख करके लेट गया। गयासुर के पीठ पर सभी देवताओं के बैठने के बावजूद वह स्थिर नहीं हो पा रहा था इसलिए एक भारी भरकम शिला, जो आज भी प्रेत शिला कहलाती है, को भी उसके ऊपर रखा गया पर कोई असर न पड़ता देख गदा धारण कर व‌िष्‍णु जी भी उस पर बैठे तब जा कर उसका शरीर स्थिर हुआ।  तब प्रभू ने गयासुर को वरदान दिया कि जब तक यह धरती रहेगी तब तक ब्रह्मा, विष्णु और 
शिव इस शिला पर विराजेंगे। इस तीर्थ का नाम गया कहलाएगा तथा इस तीर्थ से समस्त मानव जाति का कल्याण होगा। यह माना जाता है कि गया में जिसका श्राद्ध हो गया हो, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। इसीलिए गया में श्राद्ध व पिंडदान करने के बाद फिर कभी श्राद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती। मान्यता है कि गयासुर का शरीर पांच कोस में फैला हुआ था इसलिए उस पूरे पांच कोस के भूखण्ड का नाम "गया" पड़ गया। 

बिहार की राजधानी पटना से करीब 104 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है गया जिला। जहां देश के किसी
भी हिस्से से आसानी से जाया जा सकता है।  धार्मिक दृष्टि से यह न सिर्फ हिन्दूओं के लिए बल्कि बौद्ध धर्म मानने वालों के लिए भी तीर्थस्थल है। बौद्ध धर्म के अनुयायी इसे महात्मा बुद्ध का ज्ञान क्षेत्र मानते हैं जबकि हिन्दू गया को मुक्तिक्षेत्र और मोक्ष प्राप्ति का स्थान मानते हैं।इसलिए हर दिन देश के अलग-अलग भागों से नहीं बल्कि विदेशों में भी बसने वाले हिन्दू गया आकर अपने परिवार के मृत व्यकित की आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना से श्राद्ध, तर्पण और पिण्डदान करते हैं।  

शुक्रवार, 23 जून 2017

सुर, दैत्य, दानव, राक्षस सभी ऋषि कश्यप की संताने थीं !

धर्मग्रन्थों में असुरों  का वर्णन शक्तिशाली, अतिमानवीय और अर्धदेवों के रूप में किया गया है। कथाओं में उनके अच्छे और बुरे दोनों गुणों पर प्रकाश डाला गया है। असुरों में मुख्य, दैत्य दिति के तथा दानव दनु के पुत्र थे। राक्षस प्राचीन काल की एक प्रजाति का नाम था, जो रक्ष संस्कृति या रक्ष धर्म की अनुयायी थी, इसकी स्थापना रावण ने की थी....

पौराणिक कथाओं के अनुसार दानवों और राक्षसों का आपस में काफी पुराना बैर चला आ रहा था, इसी के चलते राक्षसराज रावण ने अपने ही बहनोई दानव विद्युतजिह्वा का वध कर दिया था। आम धारणा और बोलचाल में असुर, दानव, दैत्य और राक्षसों को तकरीबन एक जैसा ही माना जाता है। पर इनमें आपस में बहुत फर्क है। यह विषय काफी गूढ़ और पेचीदा है। हमारे ग्रंथों में इसको पूरी तरह परिभाषित किया गया है कि कैसे, कहां और किससे इन  उत्पत्ति हुई और किन कारणों से इनमें आपस में विद्वेष जन्मा। पर किसी एक ग्रंथ से पूरी जानकारी हासिल नहीं की जा सकती। तर्क-कुतर्क की बहुत गुंजाइश है। फिर भी सरल जानकारी के तौर पर जाना जा सकता है कि देवताओं की अदिति, दैत्यों की दिति, दानवों की दनु  और राक्षसों 
की सुरसा से उत्पत्ति हुई। जबकि इनके पिता एक ही थे, वैदिक ऋषि कश्यप, जिनकी गणना सप्तऋषियों में की जाती है। जिनका गोत्र इतना विशाल है कि माना जाता है कि सृष्टि के प्रसार में उनके वंशजों का योगदान ही सर्वोपरि है। पर  महान पिता की विभिन्न माताओं से जन्मी संताने, जो आपस में भाई-बहन ही थे, कभी भी एक मत नहीं हुए और अपने-अपने हित, स्वार्थ के लिए जिंदगी भर लड़ते-मरते रहे। वैसे कुछ विद्वानों का मानना है कि सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा और उनके कुल के लोग धरती के वासी नहीं थे। उन्होंने धरती पर अपने कुल के विस्तार की खातिर आक्रमण कर यहां दैत्यों और दानवों का दमन किया जिसकी वजह से धरती और स्वर्ग के वाशिंदों में सदा के युद्ध की शुरुआत हुई थी।  

ऐसा नहीं था कि देवताओं का विरोध करने वाले असुर सिर्फ बुरे ही थे, धर्मग्रन्थों में उनका वर्णन शक्तिशाली, अतिमानवीय और अर्धदेवों के रूप में किया गया है। कथाओं में उनके अच्छे और बुरे दोनों गुणों पर प्रकाश डाला गया है। असुरों में मुख्य, दैत्य दिति के तथा दानव दनु के पुत्र थे। राक्षस प्राचीन काल की एक प्रजाति का नाम था, जो रक्ष संस्कृति या रक्ष धर्म की अनुयायी थी। इसकी स्थापना रावण ने की थी। रक्ष धर्म को मानने वाले राक्षस कहलाते थे। एक अन्य कथा के अनुसार प्रजापिता ब्रह्मा ने समुद्रगत जल और प्राणियों की रक्षा के लिए अनेक प्रकार के प्राणियों को उत्पन्न किया। उनमें से कुछ प्राणियों ने सबकी रक्षा की जिम्मेदारी संभाली इसीलिए वे रक्षा करने वाले यानी राक्षस कहलाए। 

हालांकि इनकी छवि देवताओं के विरोधी होने की वजह से धूमिल मानी जाती है पर इन अलग-अलग जातियों में भी विद्वान, पराकर्मी, शूरवीर, धर्मात्मा और नेकदिल पुरुषों के साथ ही अनेक महिला विदुषियों का जन्म भी हुआ था, जिन्होंने अपनी विद्वता, साहस, त्याग और प्रेम से दुनिया भर में अपनी जाती का नाम रौशन किया था। इनमें कुछ प्रमुख हस्तियां थीं, शुक्राचार्य, गयासुर, मायासुर, बलि, प्रह्लाद, रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण, माल्यवान, सुमाली, मंदोदरी, सुलोचना, वृंदा, लंकिनी, त्रिजटा आदि। 

गुरुवार, 22 जून 2017

नारी प्रतिशोध की पहली मिसाल, शूर्पणखा

शूर्पणखा ने कालकेय दानव से विवाह किया था।  (उसी कालकेय जाति को "बाहुबली फिल्म" के पहले भाग में विस्तृत रूप में तथा दूसरे भाग में कुछ देर के लिए दर्शाया गया है) अपने पति के वध का पूरा सत्य जाने बिना ही उसने अपने भाई-भतीजों के साथ-साथ पूरी राक्षस जाति को उसके अंत तक पहुंचा दिया। पर उसका खुद का अंत भी एक रहस्य ही बना रहा, जब कुछ वर्षों के बाद एक दिन उसका और उसकी भाभी कुम्बिनी का शव समुद्र से बरामद हुए 

रामायण एक महाग्रंथ है इसमें दो राय नहीं है नाहीं हो सकती हैं। इसकी लोकप्रियता इतनी है कि कई भाषाओं के अलावा इसका बौद्ध, जैन तथा सिख धर्म के ग्रंथों में रूपांतरण हो चुका है। यहां तक की भारत के बाहर कम्बोडिया, बर्मा, थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया, फिलीपींस जैसे देशों में भी इसकी लोकप्रियता चरम पर है। हालांकि इसके कथानक में समय और परिवेश के अनुसार कुछ बदलाव भी आते चले गए हैं पर मूल कथानक सदा की तरह अपनी तमाम अच्छाइयों के साथ मानव को सत्यमार्ग पर चलने की सीख देता आ रहा है। 

 इस महाकाव्य की खासियत यह भी है कि इसमें पुरुषों के साथ-साथ कई स्त्री पात्र भी ऐसे हैं जिनकी पूरे कथानक में बहुत ही सशक्त व अहम भूमिका रही है। ऐसा ही एक चरित्र है राक्षसराज रावण की बहन
शूर्पणखा का। महाकाव्य पढ़ने से ऐसा लगता है कि राम-रावण युद्ध का मुख्य कारण शूर्पणखा ही है पर कुछ रचनाकारों का मत कुछ अलग भी है, जिसे नकारा नहीं जा सकता। उनके अनुसार शूर्पणखा का राम और लक्ष्मण के पास जा प्रणय निवेदन करना सिर्फ एक दिखावा था असल में वह रावण के समूल नाश की एक भूमिका थी।

शूर्पणखा ऋषि विश्रवा और उनकी दूसरी पत्नी कैकेसी की सबसे छोटी संतान थी। जो अपनी माँ के सामान ही सुंदर और रूपवती थी। अपनी सुंदर आँखों के कारण उसका नाम मीनाक्षी रखा गया था। बचपन से ही वह उच्चश्रृंखल थी। बड़ी होने पर उसने गुप्-चुप तरीके से कालकेय दानव विद्युतजिह्वा, जिसका दूसरा नाम दुष्टबुद्धि भी था, के साथ विवाह कर लिया था। दानव जाति का राक्षसों से बहुत पुराना बैर चला आ रहा था। इसलिए रावण इस विवाह से खुश नहीं था और वह दोनों को दंडित करना चाहता था पर पत्नी मंदोदरी के समझाने पर उसने दोनों को माफ़ ही नहीं किया बल्कि विद्युतजिह्वा को अपने  उच्च पद भी दे दिया। पर विद्युतजिह्वा, जिसका एक और नाम दुष्टबुद्धि भी था, का शूर्पणखा से विवाह करने का मुख्य मकसद रावण का वध कर उसके राज्य पर आधिपत्य करना था। रावण को जब उसकी असलियत का पता चला तो उसने अपने बहनोई का वध कर
डाला। शूर्पणखा को सच्चाई का पता नहीं था इसलिए उसने मन ही मन रावण के विनाश की कसम खा डाली। पर रावण की शक्ति के सामने वह कुछ भी नहीं थी। इसके लिए किसी बहुत शक्तिशाली माध्यम की जरुरत थी जिसके लिए उसे राम वनवास तक इन्तजार करना पड़ा। 

श्री राम ने जब अपने वनवास के दौरान राक्षसी ताड़का, जो शूर्पणखा की नानी थी, और सुबाहू को मार डाला तो शूर्पणखा को अपना बदला लेने की एक आशा नजर आई। फिर भी उसने श्री राम की शक्ति को आंकने के लिए अपने भाइयों खर और दूषण, जो पराक्रम में रावण के सामान थे, को सैंकड़ों सैनिकों के साथ उनसे लड़ने के लिए भेजा और उनके हश्र को देख उसने एक योजना बनाई जिसके तहत उसने दोनों भाइयों को उकसा कर अपने नाक-कान कटवा लिए। अपनी बहन का यह अपमान रावण सह नहीं पाया और उसने सीता का अपहरण कर अपने और लंका के पराभव की नींव रख दी। 

इस तरह शूर्पणखा ने बिना सत्य जाने अपने भाई-भतीजों के साथ-साथ पूरी राक्षस जाति को उसके अंत तक पहुंचा दिया। कई विद्वानों का मत है कि महासमर के बाद वह अपने भाई विभीषण और उनकी पत्नी कुम्बिनी के साथ लंका में रहने लगी थी। पर कुछ वर्षों के बाद एक दिन उसका और उसकी भाभी के शव समुद्र से बरामद हुआ था जिसके कारण का कहीं उल्लेख नहीं मिलता। 

पर ब्रह्मवैवर्तपुराण में एक कथा आती है, जिसके अनुसार भले ही किसी दूसरी योजना के तहत वह राम-लक्ष्मण से मिली थी पर श्री राम के अनुपम रूप ने उसे मोह लिया था। इसलिए महासमर के बाद उसने पुष्कर तीर्थ में ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या कर अगले जन्म में श्री राम को अपने पति के रूप में पाने का वर प्राप्त किया। जिसके तहत त्रेता युग में उसका जन्म कुब्जा के रूप में हुआ जिसे श्री कृष्ण जी ने रोग मुक्त कर अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया।  

बुधवार, 21 जून 2017

हाथ ना हों तो तकदीर तो हो सकती है पर "आधार कार्ड" नहीं बन सकता !

कहने-सुनने में तो रोज ही करोड़ों के कर्जे के माफ़ होने को आता है पर जब ऐसे लोगों की हालत सामने आती है तो लगता है कि यह सब चोंचले भी समृद्ध व समर्थ लोगों के काम ही आते हैं। अरे जब एक गरीब का आधार कार्ड नहीं बन पा रहा तो वह कर्ज माफ़ी की दसियों कागजी कार्यवाहियों से कैसे पार पा सकेगा !! 

*हाथों की लकीरों पर बराबर विश्वास नही करना चाहिए,
तक़दीर तो उनकी भी होती है जिनके हाथ नही होते।   

जिसने भी यह उक्ति लिखी होगी उसका पाला भारत के  सरकारी दफ्तरों के अपाहिज नियमों को पत्थर की लकीर मानने वाले लकीर के फ़क़ीर कारकूनों से नहीं पड़ा होगा। नाहीं उसने लाल फीताशाही जैसे सर्प का नाम सुना होगा जो दफ्तर की फाइलों पर कुंडली मारे पड़ा रहता है जिसके डर से सालों-साल उन फाइलों पर काम नहीं हो पाता। 

आज ही अखबार में एक खबर पढ़ी कि उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के सालामाबाद गांव के रहने वाले सीताराम नाम के किसान, जिनका दायां हाथ एक हादसे का शिकार हो गया था, का आधार कार्ड इसलिए नहीं बनाया जा रहा क्योंकि उनके दाएं हाथ की ऊँगलियाँ नहीं हैं। आधार कार्ड बनाने वालों का कहना है कि बिना दाएं हाथ की ऊँगलियों की छाप के यह कार्ड नहीं बन सकता। अपनी पत्नी मुन्नी के साथ जमीन के एक छोटे
से टुकड़े पर गुजरा करने वाले सीताराम जी को अब यह डर भी सता रहा है कि बिना आधार के कहीं उनकी पेंशन भी ना रोक दी जाए। जबकि अभी भी वह पिछले कई सालों से गरीबी के कारण दूसरा बैल न होने की वजह से हल को अपने कंधो पर रखकर खेत जोतने पर मजबूर हैं। सरकार की तमाम योजनाओं के बावजूद भी बुज़ुर्ग किसान तक यदि कोई मदद नहीं पहुंची है तो दोष किसका है ? 

सुना है कि अखबारों में इस दंपत्ति की फोटो छपने पर मुख्य मंत्री योगी आदित्य नाथ जी ने हर संभव सहायता देने का आश्वासन दिया है। अच्छा होता कि मौके पर ही कोई एक्शन ले लिया जाता। जिससे लोगों के मन में सरकार के प्रति थोड़ी आस्था बढ़ती। क्योंकि लोगों में धारणा गहरे पैठी हुई है कि आश्वासन तो मिलते ही रहते हैं अमल कब होता है। वैसे भी दफ्तरों की सदी-गली सालों-साल चली आ रही प्रणालियों को बदलने पर पहले ध्यान दिया जाना चाहिए। जिससे सर्वहारा को भी योजनाओं का लाभ मिल सके नहीं तो किसी का ध्येय कितना भी पवित्र हो उसका फ़ायदा सक्षम लोग ही ले उड़ते रहेंगे। 

कहने-सुनने में तो रोज ही करोड़ों के कर्जे के माफ़ होने को आता है पर जब ऐसे लोगों की हालत सामने आती है तो लगता है कि यह सब चोंचले भी समृद्ध व समर्थ लोगों के काम ही आते हैं। अरे जब एक गरीब का आधार कार्ड नहीं बन पा रहा तो वह कर्ज माफ़ी की दसियों कागजी कार्यवाहियों से कैसे पार पा सकेगा !! 
क्या माननीय योगी आदित्यनाथ जी इस ओर ध्यान देंगे ?   

मंगलवार, 13 जून 2017

शनिवार वाड़ा, पेशवा बाजीराव का किला

शनिवार वाड़ा,  महाराष्ट्र राज्य के पुणे ज़िले में स्थित वह दुर्ग है जिसका निर्माण 1746 में छत्रपति साहू जी के
शनिवारवाडा में बाजीराव पेशवा की प्रतिमा 
प्रमुख सरदार, पेशवा बाजीराव 
 ने अंग्रेजों के साथ अपने तीसरे युद्ध के दौरान करवाया था। ऐसा कहा जाता है कि एक बार पेशवा बाजी राव को यहाँ एक खरगोश के डर से कुत्ते को भागते देख इस जगह पर किला बनाने की प्रेरणा मिली। इस सात मंजिला इमारत के सबसे ऊपरी भाग में पेशवा की अपनी रिहाइश थी जिसे "मेघदंबरी" के  नाम से जाना जाता था। जहां से 17 की.मी. दूर, आलंदी का जनेश्वर मंदिर  साफ़  नजर आता था। हालांकि 1838 में हफ्ते भर तक लगी रही एक 

आग से इसकी कई इमारतें पूरी तरह नष्ट हो गयी थीं, पर बचे हुए हिस्से को संरक्षित कर अब इसे एक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कर दिया गया है। इस किले की नींव शनिवार के दिन रखी गई थी इसलिए इसका नाम शनिवार वाडा पड़ा। इस पर 1818 तक पेशवाओं की हुकूमत रही। इसके पांच प्रवेश द्वार हैं -   
दिल्ली दरवाजा : यह इस किले का सबसे प्रमुख द्वार है, उत्तर दिशा में स्थित यह द्वार इतना ऊँचा और चौड़ा है कि हौदे सहित हाथी निकल सकता है। हमले के वक़्त हाथियों से इस गेट को बचाने लिए इस गेट के दोनों पलड़ो में 12 इंच लम्बे 72 नुकीले कीले लगे हुए है जो कि हाथी के माथे तक की ऊँचाई तक जाते हैं। दरवाज़े के दाहिने पल्ले में एक छोटा द्वार है जो सैनिको के आने जाने के लिए बनाया गया था। 
मुख्य द्वार 

मस्तानी दरवाजा : यह दरवाज़ा दक्षिण दिशा की ओर खुलता है। बाजीराव  की पत्नी मस्तानी जब किले से बाहर जाती तो इस दरवाज़े का उपयोग करती थी।  इसलिए इसका नाम मस्तानी दरवाज़ा है। वैसे इसका एक और नाम अली बहादुर दरवाज़ा भी है।
मस्तानी दरवाजा 

खिड़की दरवाजा : यह पूर्व दिशा में खुलने वाले दरवाज़े में एक खिड़की बनी हुई है, इसलिए इसे खिड़की दरवाज़ा कहा जाता है।

जंभुल दरवाजा :  दक्षिण दिशा में स्थित इस द्वार से दास-दासियों का महल में आना-जाना होता था। नारायण राव पेशवा की ह्त्या के बाद उसकी लाश के टुकड़ो को इसी रास्ते से किले के बाहर ले जाया गया था इसलिए इसे नारायण दरवाज़ा भी कहा जाता है।


गणेश दरवाजा : किला परिसर में स्थित गणेश रंग महल के पास दक्षिण-पूर्व दिशा में स्थित होने के कारण  इसे गणेश द्वार का नाम दिया गया है।  

जैसा कि अधिकाँश किलों के साथ बर्बर घटनाएं भी जुडी होती हैं इस किले के साथ भी एक षड्यंत्र की कहानी जुडी हुई है। बाजीराव पेशवा के तीन पुत्र थे। विश्वासराव, महादेव राव और नारायण राव। विश्वासराव पानीपत की तीसरी लड़ाई में मारे गए थे। बाजी राव की मृत्यु के पश्चात् महादेव राव राजा बने पर कुछ समय पश्चात् ही उनका भी निधन हो गया तब सिर्फ सोलह साल की आयु में नारायण राव को गद्दी पर बैठना पड़ा। पर जैसाकि राजपरिवारों में होता रहा है, नारायण राव के काका-काकी, रघुनाथ राव और आनंदी बाई, उनके राजा बनाने से खुश नहीं थे उन्होंने  षड्यंत्रपूर्वक गार्दी कबीले के लोगों से मिल नारायण राव की ह्त्या करवा दी। कई लोगों का ऐसा भी कहना है कि रघुनाथ राव बालक को मारना नहीं चाहते थे इसलिए उन्होंने अपने संदेश में लिखा था  "नारायणराव ला धरा" जिसे उनकी पत्नी ने "नारायणराव ला मारा" कर दिया था।  बालक ने अपने अंतिम क्षणों में अपने काका से अपने को बचाने की गुहार लगाईं, पर होनी हो कर रही। कहते हैं बच्चे नारायण राव की आत्मा आज भी किले में "काका माला बचावा" कहते हुए दौड़ती, सुनाई पड़ती है। इसलिए इस किले को देश के अभिशप्त किलों में शुमार किया गया है। 

अब जैसे-जैसे पुणे की आबादी बढती जा रही है, वैसे-वैसे किले के चारों ओर सड़कों, दुकानों का जाल भी बिछता जा रहा है। जरुरत है ऐसी ऐतिहासिक धरोहरों को गंभीरता से संरक्षण देने की, बचाने की।